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ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को ₹25,000 करोड़ का नुकसान, स्क्रैपेज

ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को ₹25,000 करोड़ का नुकसान, स्क्रैपेज

भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को वित्त वर्ष 2026 में एक बड़ा झटका लग सकता है। सरकार की स्क्रैपेज पॉलिसी के तहत एक नया प्रावधान लागू होने से इंडस्ट्री को ₹25,000 करोड़ का नुकसान हो सकता है।

  • वित्त वर्ष 2026 में ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के शुद्ध मुनाफे में ₹25,000 करोड़ की चोट लग सकती है।
  • स्क्रैपेज पॉलिसी के तहत एक नया प्रावधान लागू होने से ऑटो कंपनियों को पिछले 20 वर्षों में बेची गईं प्राइवेट गाड़ियों के लिए और 15 वर्षों में कमर्शियल गाड़ियों के लिए EPR सर्टिफिकेट के खर्चों को लेकर बड़ा वित्तीय प्रावधान करना पड़ सकता है।
  • इंडस्ट्री के अनुमान के हिसाब से इस नियम के चलते चार पहिया बनाने वाली कंपनियों पर ₹14,623 करोड़ और दोपहिया-तिपहिया गाड़ियां बनाने वाली कंपनियों पर वित्त वर्ष 2026 में ₹9,650 करोड़ का असर पड़ सकता है।

पाठकों को यह जानकारी क्यों महत्वपूर्ण है: यह जानकारी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के वित्तीय स्वास्थ्य और सरकार की नीतियों के प्रभाव को समझने में मदद करती है। यह जानकारी केवल सामान्य जानकारी के लिए है और व्यक्तिगत सलाह के रूप में नहीं दी जानी चाहिए।

देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को वित्त वर्ष 2026 के शुद्ध मुनाफे में करीब ₹25 हजार करोड़ की चोट लगने वाली है। इसकी वजह ये है कि एंवायर्नमेंट प्रोटेक्शन (एंड-ऑफ-लाइफ-वेईकल्स) रूल्स, 2025 यानी स्क्रैपेज पॉलिसी के तहत एक अकाउंटिंग स्टैंडर्ड क्लॉज एक्टिव हो गया है। इसमें ऑटो कंपनियों को पहले की बेची हुई गाड़ियों को लेकर पर्यावरणीय मुआवजे के लिए बजटीय प्रावधान करना पड़ सकता है। इंडस्ट्री के एग्जीक्यूटिव्स के मुताबिक इस साधारण से दिखने वाला प्रावधान को मिनिस्ट्री ऑफ एंवायर्नमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेंट चेंज ने जनवरी 2025 में नोटिफाई किया था और जब इसके असर के बारे में ऑडिटर्स ने ध्यान दिलाया तो ऑटो कंपनियां परेशान हो गईं।

क्या है इस प्रावधान में?

जनवरी 2025 के नोटिफिकेशन के रूल 4(6) के मुताबिक अगर कोई गाड़ी कंपनी अपना कारोबार बंद करती है तो इसे कारोबार बंद होने से पहले तक मार्केट में उपलब्ध गाड़ियों को लेकर EPR (एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पांसिबिलिटी) का पालन करना होगा। इस नियम के चलते IND AS 37 लागू होता है, जिसके तहत इंडस्ट्री के एक एग्जीक्यूटिव के मुताबिक ऑटो कंपनियों को पिछले 20 वर्षों में बेची गईं प्राइवेट गाड़ियों के लिए और 15 वर्षों में कमर्शियल गाड़ियों के लिए EPR सर्टिफिकेट के खर्चों को लेकर बड़ा वित्तीय प्रावधान करना पड़ सकता है। इंडस्ट्री के एक और अधिकारी के मुताबिक इस नियम के चलते गाड़ी कंपनियों को पहले की बेची गई गाड़ियों को लेकर EPR प्रावधान करना होगा, चाहे उनका बाजार से बाहर निकलने का कोई इरादा न हो। इससे उनका पैसा फंसेगा और मुनाफे पर असर पड़ेगा।

SIAM ने मिनिस्ट्री तक पहुंचाई इंडस्ट्री की दिक्कतें

इंडस्ट्री बॉडी SIAM (सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स) इस मामले को लेकर मिनिस्ट्री के पास लेकर गई। न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक सियाम ने मिनिस्ट्री से कहा कि CPCB (सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) के पर्यावरणीय मुआवजे की लागत से जुड़े नोटिफिकेशन के बाद गाड़ी बनाने वाली कंपनियों को तगड़ा वित्तीय शॉक लग सकता है। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में करीब ₹25 हजार करोड़ का एकमुश्त असर ग्रास बेसिस पर पड़ सकता है। सियाम ने इस नोटिफिकेशन के आने से पहले रूल 4(6) में संशोधन कर इस मुद्दे को हल करने की संभावना जताई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एकमुश्त बजटीय प्रावधान की जरूरत नहीं है। हालांकि मिनिस्ट्री ने 27 मार्च 2026 को जो संशोधित नोटिफिकेशन पेश किया है. उसमें इस क्लॉज में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

इंडस्ट्री के एक एग्जीक्यूटिव के मुताबिक अकाउंटिंग बुक में प्रोविजन किया गया तो उस साल पूरी ऑटो इंडस्ट्री के मुनाफे में भारी कमाई आएगी। इंडस्ट्री के अनुमान के हिसाब से इस नियम के चलते चार पहिया बनाने वाली कंपनियों पर ₹14,623 करोड़ और दोपहिया-तिपहिया गाड़ियां बनाने वाली कंपनियों पर वित्त वर्ष 2026 में ₹9,650 करोड़ का असर पड़ सकता है।

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पाठकों को इसे टैक्स और अनुपालन से जुड़े अपडेट के रूप में देखना चाहिए, न कि व्यक्तिगत सलाह के रूप में।

यह लेख उपलब्ध स्रोत-सूचना के आधार पर सामान्य जानकारी के लिए है। इसे कानूनी, टैक्स, निवेश या वित्तीय सलाह न माना जाए।

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